कोर्ट ने कहा है कि राज्य बंटवारे के बाद आरक्षित श्रेणी में आने वाला व्यक्ति दोनों में से किसी भी राज्य में आरक्षण के लाभ का दावा कर सकता है

डेली जनमत न्यूज डेस्क। आरक्षण के लाभ और राज्यों के बंटवारे के अलग-अलग मामलों में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (supreme court)ने फैसला सुनाया। एक मामले में कोर्ट ने कहा कि दो राज्यों में आरक्षण के लाभ का दावा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है। कोर्ट ने कहा है कि राज्य बंटवारे के बाद आरक्षित श्रेणी में आने वाला व्यक्ति दोनों में से किसी भी राज्य में आरक्षण के लाभ का दावा कर सकता है, लेकिन वह दोनों राज्यों में आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के मामले में यह फैसला सुनाया है। वहीं, दूसरे मामले में कोर्ट ने कहा कि विलय के बाद नए राज्य में कर्मी को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

केस 1ः 

कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए झारखंड की राज्य प्रशासनिक सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद नियुक्ति न पाने वाले पंकज कुमार की याचिका स्वीकार की और आदेश दिया कि पंकज कुमार 2007 में निकले विज्ञापन संख्या-11 के मुताबिक तीसरी संयुक्त सिविल सर्विस परीक्षा, 2008 में चयन और वरिष्ठता के साथ नियुक्ति पाने के अधिकारी हैं। उनकी नियुक्ति की जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने झारखंड के उन 15 सिपाहियों की नौकरी भी बहाल करने का आदेश दिया जिन्हें करीब तीन साल नौकरी करने के बाद निकाल दिया गया था। दोनों मामलों में बिहार बंटवारे के बाद बने झारखंड में आरक्षण के लाभ का विवाद शामिल था।

केस 2  

सुप्रीम कोर्ट(supreme court) ने एक फैसले में कहा कि विलय के बाद यदि कर्मी नए राज्य में जाते हैं तो वे उस राज्य के ही निवासी माने जाएंगे और उसे सेवा में आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। भले ही उनका निवास पुराना राज्य ही क्यों न हो। जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने यह आदेश देते हुए झारखंड हाईकोर्ट के आदेश निरस्त कर दिया, जिसमें एक कर्मचारी को राज्य में माइग्रेट होकर आया माना गया और उसे आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट (supreme court)आए थे। गौरतब है कि वर्ष 2000 में झारखंड के गठन से पूर्व पटना के पंकज कुमार हजारीबाग में शिक्षक के रूप में काम कर रहे थे। झारखंड अगल राज्य बनने पर उन्होंने झारंखड को ही चुना और वहीं विलय करवा लिया। 2008 में उन्होंने संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा दी और 2010 में आए परिणाम में आरक्षित वर्ग में पांचवें नंबर पर चयनित हो गए। मगर जब नियुक्ति की बात आई तो राज्य ने उन्हें नियुक्ति नहीं दी और कहा कि उनकी सेवा पंजिका में निवास का स्थायी स्थान पटना लिखा हुआ है, वह झारखंड के निवासी नहीं हैं, बल्कि माइग्रेंट हैं। इस मामले को वह हाईकोर्ट ले गए। एकल पीठ ने उनके पक्ष में फैसला दिया लेकिन इसके खिलाफ राज्य सरकार ने फुल बेंच में अपील की और 2:1 के अनुपात में उसने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला देकर उन्हें माइग्रेंट ही माना।

दो राज्यों में बंट गया बिहार

वर्ष 2000 में बिहार राज्य को दो हिस्सों में बांट दिया गया था। एक राज्य बिहार और दूसरा नया राज्य झारखंड बना दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जो कर्मचारी एससी-एसटी वर्ग के हैं, उनकी जाति या जनजाति संविधान के आदेश, 1950 व बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 23 व 24 के तहत अधिसूचित है और जो लोग ओबीसी वर्ग के हैं उनके लिए अलग से ओबीसी वर्ग का नोटिफिकेशन निकला है, उन्हें आरक्षण का लाभ मिलेगा। उनके आरक्षण के हित बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 73 के तहत संरक्षित रहेंगे। कोर्ट ने कहा इस अधिकार का दावा सरकारी नौकरी में किया जा सकता है। आरक्षित वर्ग में आने वाला व्यक्ति दो में से किसी भी राज्य चाहें बिहार या झारखंड में आरक्षण का लाभ पाने का हकदार है, लेकिन वह दोनों राज्यों में एक साथ आरक्षण के अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

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