मां ब्रम्हचारिणी के दूसरे रुप की हो रही पूजा अर्चना।

कानपुर। भारत देश में जहां शारदीय नवरात्र पर्व की शुरूआत हो गई है। पावन शुरूआत में कल माता दुर्गा के पहले रूप में मां शैलपुत्री का पूजन किया गया। और आज मां ब्रम्हचारिणी के दूसरे रुप की पूजा बड़े ही धूमधाम से की जा रही है।

कोरोना के बाद इस बार नवरात्रि को लेकर लोगों के बीच खुशी और उत्साह देखते ही बन रहा है। वहीं माता के मंदिरों में भक्तों का तांता लग रहा है लोग सुबह से ही माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे है। बता दें कानपुर में भी नौ देवियों की प्रसिद्ध सिद्धपीठ हैं, जिनके बारे में जानना आपके लिए जरुरी हो जाता है।

कानपुर का प्रसिद्ध तपेश्वरी मंदिर

कानपुर में बिरहाना रोड के तपेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा हुआ है। जिसकी मान्यता श्रीराम के परिवार, माता सीता और लवकुश से जुड़ी है। मान्यता है कि माता सीता ने इसी मंदिर में लव और कुश का मुंडन संस्कार और कनछेदन कराया था। कहा जाता है कि मंदिर में पूजा करने और माता से मुराद मांगने पर निसंतान दंपतियों की संतान की मुराद पूरी होती है। नवरात्रि के दिनों में यहां पर मुंडन और कर्ण छेदन कराने वालों का भी हुजूम उमड़ता है। जहांआज माता का मंदिर है कहा जाता है माता सीता जी ने यहीं पर रुक कर तीन स्त्रियों के साथ पूजा अर्चना की थी। यहां पर जो माता की मूर्ति उत्पन्न हुई उसे मां तपेश्वरी देवी के नाम से जाना गया।  

मां बारा देवी मंदिर

कानपुर के दक्षिण में स्थित बारा देवी का मंदिर प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के इतिहास के बारे में कोई सटीक जानकारी तो अब तक नहीं मिली लेकिन कानपुर और उसके आस- पास के जिलों में रहने वाले लोगों कीइस मंदिर में गहरी आस्था है। मंदिर के पुजारी के मुताबिक पिता से हुई अनबन को लेकर एक घर से एक साथ 12 बहनें चली गईं। सभी बहनें मूर्ति बनकर स्थापित हो गई। कई साल बाद यही 12 बहनें बारादेवी नाम से प्रसिद्ध हुई। बताया जाताहै कि बहनों के श्राप की वजह से उनके पिता भी पत्थर के हो गए। 

माता आशा देवी का मंदिर

कल्याणपुर क्षेत्र में बना माता आशा देवी का मंदिर शहर और आस-पास के जिलों में भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस ऐतिहासिक मंदिर का इतिहास माता सीता से जुड़ा हुआ है। भक्तों का मानना है कि माता सीता ने शिला पर माता की आकृति बनाकर पूजन अर्चन शुरू किया था। माता सीता की कामनापूरी होने की वजह से मंदिर का नाम आशा देवी मंदिर पड़ा। 

काली बाड़ी मंदिर

लालबंगला के हरजेंदर नगर में कालीबाड़ी मंदिर में मां काली करुणामयी स्वरूप में विराजमान हैं। नवरात्र के दिनों में यहां मां केविशेष पूजन को भक्त बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। मान्यता है मां भगवती ने स्वप्न दिया, जिससे प्रेरित होकर बंगाली समाज के बुजुर्गों ने मंदिर की स्थापना कराई थी। राजस्थान के किशनगढ़ से विशेष कोष्ठी पत्थर से प्रतिमा बनाई गई थी।

मां चण्डिका देवी का मंदिर

शहर के बीचों-बीच बना देवनगर में चण्डिका देवी चौराहे को मां के मंदिर के नाम पर जाना जाता है। माना जाता है। मां चण्डिका देवी मंदिर में लगभग 76 सालों से अखंड ज्योति कमल के पत्ते पर जल रही है। साल में पड़ने वाले दोनों नवरात्रों में अखंड ज्योति के लिए पात्र में तेल डाला जाता है।

माता कुष्मांडा का मंदिर

दुर्गा सप्तशती के अनुसार नवरात्रि का चौथा दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। उन्हें नेत्रों की देवी माना जाता है। देवी मां के चतुर्थ स्वरूप कूष्मांडा देवी का उत्तर भारत में एकमात्र मंदिर कानपुर के घाटमपुर में बना है,जिसका हजारों साल पुराना इतिहास है। कहते हैं प्राचीन काल में मांडानाम एक राक्षस हुआ करता था। जिसके अत्याचार से पूरे ब्रह्माण्ड के लोग परेशान थे। मांडानाम के राक्षस से छुटकारा दिलाने के लिए उन्होंने मां दुर्गा की कुश की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा की। इसके बाद मां दुर्गा ने उसी कुश की मूर्ति से अवतार लेकर मांडा राक्षस का वध किया जिस कारण उनका नाम कुष्मांडा पड़ा। 

माता भद्रकाली मंदिर का इतिहास

घाटमपुर तहसील के भदरस गांव में भद्रकाली माता का मंदिर भी हजारों साल पुराना है। कहा जाता है कि मां भद्रकाली के नाम पर पहले भदरस गांव का नाम भद्रपुर था। मान्यता है कि भद्रकाली माता मंदिर में रोज सुबह माता की पहली पूजा अपने आप हो जाती है। मान्यता के मुताबिक अदृश्य भक्त भोर पहर में उनकी पूजा करता है। आज तक उसे कोई देख नहीं पाया है।

मां जंगली देवी मंदिर

कानपुर शहर में किदवई नगर के पास माता जंगली देवी का भव्य मंदिर है। कहते हैं कि यहां पर जो भी भक्त ईंट रखकर मुराद मांगता है माता उसकी सारी मुरादें पूरी करती हैं इतना ही नहीं ये भी कह जाता है कि मूर्ति के पीछे बनी नाली में ईट रखने के बाद उस ईट को निर्माणाधीन मकान में लगाने से तरक्की होती है और घर का काम जल्दी निपट जाता है। इस मंदिर का बहुत ही प्राचीनतम इतिहास है, घने जंगल के बीचो-बीच स्थित होने से ये स्थान जंगली देवी मंदिर के नाम से विख्यात हो गया।

नगेली देवी मंदिर

घाटमपुर क्षेत्र के नगेलिनपुर गांव स्थित नगेली माता का मंदिर सैकड़ों साल पुराना है। नगेली माता मंदिर की मीनारें और कलाकृति मस्जिद नुमा आकार की बनी हैं। नगेली देवी मंदिर के पीछे एक तलाब बना है। मान्यता है कि तालाब के जल के स्पर्श मात्र से रोगों का निवारण होता है। 

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