18 साल की उम्र में हुई थीं बीमार, बैद्य ने बालू खाने की दी थी सलाह।

वाराणसी। तुअर की दाल के अलावा चावल में खाने के वक्त कंकड़ आ जाए तो मुंह का पूरा टेस्ट खराब हो जाता है, लेकिन वाराणसी स्थित गंगा किनारे रहने वाली कुसुमावती देवी (80) रोजाना भोजन के वक्त आधा किलो बालू खाती हैं। बालू की व्यवस्था उनके बेटे करते हैं और इसके लिए उन्हें हर माह एक से डेढ़ हजार रूपए खर्च करने पड़ते हैं। बुजुर्ग महिला ने बताया कि वह 18 वर्ष की उम्र से बालू खाती आ रही हैं। पेट में जैसे ही ये जाती है, वैसे शरीर में एनर्जी आ जाती है। 

पेट की बीमारी 

कुसमावती देवी ने बताया कि बचपन में उन्हें पेट की बीमारी हो गई थी। स्थानीय बैद्य ने उन्हें रोजाना आधा गिलास दूध और दो चम्मच बालू खाने के लिए कहा था। जिसके बाद से वह रोजाना बालू खाने की आदत हो गई।  कुसुमादेवी बताती हैं कि, पहले पिता व बड़े भाई गंगा किनारे जाते और हरदिन मुझे ताजी बालू लाकर देते। जिसे मैं दिन में तीन बार खाती। बुजुर्ग महिला बताती हैं कि बालू के सेवन करने के बाद वह कभी बीमार नहीं पड़ी। खेती-बाड़ी में पिता का हाथ बटाती तो हरदिन पांच किलो की यात्रा भी करतीं। 

ससुराल में पड़ गई बीमार 

कुसमावती देवी ने बताया, कि जब उनकी शादी हुई तो उन्हें ससुराल में तीन दिन तक बालू खाने को नहीं मिला था। जिसके चलते उनकी तबियत खराब हो गई थी। पति ने डॉक्टर्स को दिखाया, पूरा चेकअप भी हुआ, लेकिन आराम नहीं मिला। डॉक्टर्स भी मेरी बीमारी का पता नहीं लगा पाए थे। मैंने पति से बालू की डिमांड की। वह गंगा घाट जाकर बालू लेकर आए और मुझे दिया। सुबह के वक्त जैसे ही बालू मेरे पेट के अंदर गई, मैं पूरी तरह से ठीक हो गई और ये सिलसिला तब से लागतार जारी है।

बेटे करते हैं बालू की व्यवस्था 

कुसमावती देवी बताती हैं कि बालू खाने का इंतजाम उनके बेटे करते है। वहीं वह बालू भी खाती है तो सिर्फ गंगा नदी का. साथ ही वह सुबह नाश्ता करें या नहीं, लेकिन समय बालू खाना नहीं भूलती है। कुसमावती के बेटे ने बताया है कि, मां तीन समय बालू खाती है। बताया, उन्हें बालू खाने से एनर्जी मिलती है। इतना ही नहीं वह आज भी 2 फीट तक की नाली को कुंदकर पार कर जारी हैं। बेटे ने बताया कि मां बालू खाने की आदत पर एक से डेढ़ हजार रुपए का खर्च हो जाते हैं।

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