मान्यता है कि मंदिर से कोई खाली हाथ नहीं जाता।

उन्नाव। बक्सर के गंगा तट पर स्थित मां चंडिका देवी के दर्शन करने आने वाला हर भक्त कभी खाली हाथ नहीं जाता है। आम बोलचाल की भाषा में चंडिका देवी मंदिर को चंद्रिका देवी मंदिर कहा जाने लगा है। संत शोभन सरकार ने मां के इस मंदिर को भव्य स्वरूप दिया है। इस मंदिर को सात सिद्ध शक्तिपीठों में जाना जाता है। मार्कण्डेय पुराण व सप्तसती में मां चंडिका देवी का धाम शक्तिपीठों में वर्णित है। बक्सर स्थित मां के दरबार में पुण्य सलिला गंगा काशी की ही तरह उत्तर मुख होकर बहती हैं। बक्सर में वैदिक काल में राजा सुरथ व समाणि वैश्य को मेधा ऋषि ने ज्ञान प्रदान किया था। पौराणिक आख्यानों में कहा है कि विश्वामित्र ने भी मां के दरबार में तपस्या कर सप्तसती मंत्रों का सृजन किया। गायत्री मां का साक्षात्कार भी उन्हें यहीं हुआ। इस पवित्र शक्ति पीठ मेें राजा वसुमान, स्वामी सत्संगानंद, बक्कड बाबा जगदीशनंद, शिवानंद जैसे महपुरुषों ने तपस्या कर अनेक चमत्कारिक सिद्धियां प्राप्त की। जो आज भी लोगों में चर्चा का बिंदु रहती हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा फाह्यान ने भी अपनी यात्रा में मंदिर का उल्लेख किया है। बौद्ध धर्म के अनुयायी साधाराम ने भी इसी मनोरम स्थान पर अपना आश्रम बनाया।

मंदिर का पौराणिक महत्व

पुराणों में उल्लेख है कि सती होने के बाद भगवान शिव माता पार्वती को अपने कंधे पर लेकर ब्रह्मांड का भ्रमण कर रहे थे। जहां-जहां पर पार्वती जी के शरीर के भाग गिरे वही स्थान शक्तिपीठ कहलाए। बक्सर स्थित मां चंडिका देवी में कटि भाग गिरा। इसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, तंत्र चूणामणि तथा देवी भागवत पुराण में है। शारदीय नवरात्र में कानपुर, फतेहपुर, रायबरेली जिलों के हजारों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। यहां के महंत रविकांत मिश्रा का कहना है कि ये सात सिद्धपीठ मंदिरों में से एक है। माता को प्रसन्न करने के लिये यहां विश्वामित्र ने तपस्या की थी। डरकर इंद्र ने तपस्या भंग करने के लिये मेनका को भेजा था।  

कुशली का प्रसाद है प्रसिद्ध

बक्सर में प्रसाद के रूप मेें कुशली (गुझिया) प्रदेश में अपनी अलग पहचान रखती है। नवरात्र पर मुंडन, कर्ण छेदन के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मंदिर से सटा ग्वालियर वाले महराज का शारदा आश्रम भक्तों को शांति प्रदान करता है।

बक्सर के गंगा तट पर स्थित मां चंडिका देवी के दर्शन करने आने वाला हर भक्त कभी खाली हाथ नहीं जाता है। आम बोलचाल की भाषा में चंडिका देवी मंदिर को चंद्रिका देवी मंदिर कहा जाने लगा है। संत शोभन सरकार ने मां के इस मंदिर को भव्य स्वरूप दिया है।

विश्व के सात शक्तिपीठों में है शुमार 

मार्कण्डेय पुराण व सप्तसती में मां चंडिका देवी का धाम शक्तिपीठों में वर्णित है। बक्सर स्थित मां के दरबार में पुण्य सलिला गंगा काशी की ही तरह उत्तर मुख होकर बहती हैं। बक्सर में वैदिक काल में राजा सुरथ व समाणि वैश्य को मेधा ऋषि ने ज्ञान प्रदान किया था। पौराणिक आख्यानों में कहा है कि विश्वामित्र ने भी मां के दरबार में तपस्या कर सप्तसती मंत्रों का सृजन किया। गायत्री मां का साक्षात्कार भी उन्हें यहीं हुआ। इस पवित्र शक्ति पीठ मेें राजा वसुमान, स्वामी सत्संगानंद, बक्कड बाबा जगदीशनंद, शिवानंद जैसे महपुरुषों ने तपस्या कर अनेक चमत्कारिक सिद्धियां प्राप्त की। जो आज भी लोगों में चर्चा का बिंदु रहती हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा फाह्यान ने भी अपनी यात्रा में मंदिर का उल्लेख किया है। बौद्ध धर्म के अनुयायी साधाराम ने भी इसी मनोरम स्थान पर अपना आश्रम बनाया।

ये है मंदिर का इतिहास

पुराणों में उल्लेख है कि सती होने के बाद भगवान शिव माता पार्वती को अपने कंधे पर लेकर ब्रह्मांड का भ्रमण कर रहे थे। जहां-जहां पर पार्वती जी के शरीर के भाग गिरे वही स्थान शक्तिपीठ कहलाए। बक्सर स्थित मां चंडिका देवी में कटि भाग गिरा। इसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, तंत्र चूणामणि तथा देवी भागवत पुराण में है। शारदीय नवरात्र में कानपुर, फतेहपुर, रायबरेली जिलों के हजारों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

मंदिर का इतिहास

इस सिद्धि पीठ मां चंडिका देवी धाम का पुराणों मे भी वर्णन हुआ है। पुराण के अनुसार यही पर मेधा ऋषि ने राजा सुरथ व समाधि वैश्य को मां दुर्गा के महात्म्य का वर्णन सुनाया था। जो दुर्गा सप्तशती के नाम से विख्यात है। महाभारत काल मे बलराम ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी। यहां पर परम तपस्वी वक्र ऋषि का आश्रम था कहा जाता है इन्हीं के नाम पर इस ग्राम का नाम बक्सर पड़ा था। यहां गंगा कुछ समय के लिए उत्तरमुखी प्रवाहित होने के कारण इस स्थान को काशी की तरह पवित्र माना जाता है। जिस स्थान पर मेधा ऋषि ने राजा सूरथ को दुर्गा सप्तशती सुनाई थी उसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण के भाई बलराम ने भी माथा टेका था। वहीं पर मां चंडिका देवी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यहां दो प्रतिमाएं मां चंडिका व अम्बिका की स्थापित हैं।

मंदिर पहुंचने का मार्ग

उन्नाव होकर चंडिका देवी जाने वाले भक्त रायबरेली मार्ग के लालकुआं से बक्सर होकर मां के दरबार जा सकते हैं। इसके अलावा रायबरेली के लालगंज से बक्सर मार्ग भी मंदिर तक आता जाता है। मंदिर आने जाने के लिए निजी यात्री वाहन चलते हैं।

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