रोहिंग्याओं को बसाने के मंत्री के बयान पर बवाल।

नई दिल्ली। दिल्ली में रह रहे एक हजार से ज्यादा रोहिंग्याओं को अब टेंट में रहने पर मजबूर नहीं होना पड़ेगा। उन्हें अब रहने के लिए पक्की छत वाले मकान मिलने वाले हैं। उन्हें जल्द ही 250 सरकारी आवासों में शिफ्ट किया जाएगा। इसका ऐलान केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने किया है।   

मंत्री हरदीप सिंह पुरी के ट्वीट के बाद से बवाल भी शुरू हो गया। कई राजनीतिक पार्टियां केंद्र सरकार के इस फैसले से नाखुश नजर आ रही हैं। 

रोहिंग्याओं के टेंट के लिए हर महीने 7 लाख रुपए होते हैं खर्च

टेंट में रहने वाले लगभग 1,100 रोहिंग्याओं को बुनियादी सुविधाओं और चौबीसों घंटे सुरक्षा से लैस फ्लैटों में शिफ्ट किया जाएगा। इस साल जुलाई में हुई बैठक में ये बात सामने आई थी मदनपुर खादर में बनाए गए शिविरों में आग लगने के बाद जिस जगह रोहिंग्या परिवारों को बसाया गया, उसके लिए दिल्ली सरकार 7 लाख रुपये प्रति महीने टेंट का किराया दे रही है।

फ्लैट में होगी हर सुविधा

दिल्ली सरकार का सामाजिक विकास मंत्रालय इन फ्लैट्स में पंखा, 3 वक्त का भोजन, लैंडलाइन फोन, टेलीविजन और मनोरंजन की सुविधाएं मुहैया करवाएगा। नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् ने कोरोना महामारी के दौरान आइसोलेशन सेंटर की तरह उपयोग करने के लिए दिल्ली सरकार को ये फ्लैट्स दिए थे।

रोहिंग्या शरणार्थियों को मिलेंगे फ्लैट

मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने रोहिंग्या शरणार्थियों को नई दिल्ली में आर्थिक कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के फ्लैटों में शिफ्ट करने के सरकार के इस फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा भारत ने हमेशा उन लोगों का स्वागत किया है जिन्होंने देश में शरण मांगी है। हरदीप सिंह पुरी ने  ट्वीट करते हुए लिखा सभी रोहिंग्या शरणार्थियों को दिल्ली के बक्करवाला इलाके में EWS फ्लैट में शिफ्ट किया जाएगा। उन्हें हर जरूरी चीजें मुहैया कराई जाएंगी। इसके साथ हीदिल्ली पुलिस संरक्षण का भी इंतजाम करेगी।   

फिल्ममेकर अशोक पंडित और नूपुर शर्मा ने जताई नाराजगी

सरकार के रोहिंग्या शरणार्थियों को EWS फ्लैट में शिफ्ट करने पर फिल्ममेकर अशोक पंडित और बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने नाराजगी जताई। अशोक पंडित ने सरकार को आगाह करते हुए ट्वीट में लिखा कि भारत को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। मंत्री हरदीप सिंह पुरी के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा कि सर ये एक बड़ी भूल है। इसका खामियाजा भारत को बाद में भुगतना पड़ेगा। हम उन्हें किससे बचा रहे हैं। वहीं नूपुर शर्मा ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि हम संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन 1951 के हस्तारक्षरकर्ता नहीं है। इसके लिए बाध्य नहीं हैं। 

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