कानपुर में क्यों कहा झाड़े रहो कलक्टरगंज।

अटल बिहारी वाजपेयी ने जब दहेज में मांग लिया था पाकिस्तान | Atal Bihari Vajpayee | Latest News | DJN

डेली जनमत न्यूज। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन 25 दिसंबर को धूमधाम से पूरे देश में मनाया जाता है। अटल विहारी वाजपेयी एक ऐसा प्रखर वक्ता और राजनेता थे, जिनके आगे पूरी दुनिया झुकती थी। अपनी कविता और वाक्य शैली से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी वह रुक रुककर बोलने की शैली को लोग कायल थे। आज उनसे जुड़े कई संस्मरण बताने जा रहे हैं। 

जब पाकिस्तानी महिला रिपोर्टर ने कहा मै आपसे शादी करना चाहती हूं...

बात 1999 की है जब अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री थे। उस समय भारत और पाकिस्तान के समझौते से एक बस सेवा शुरू हुई थी, जिसे अमृतसर-लाहौर बस सेवा नाम दिया गया। 

इस बस का उद्घाटन स्वयं अटल जी ने बस में सफर कर के किया था। उन्होंने बस में लाहौर तक कि यात्रा की थी। लाहौर में उनका भव्य स्वागत हुआ था। उन्होंने वहां की गवर्नर हाउस में भाषण देते हुए कहा था कि- ‘तुम दोस्त बदल सकते हो पड़ोसी नही, तुम इतिहास बदल सकते हो भूगोल नही’। उसी समय वहां मौजूद ने एक महिला पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप आज तक अविवाहित क्यो हैं और मैं आपसे शादी करना चाहती हूं, लेकिन मेरी शर्त है कि आपको मुंह दिखाई में कश्मीर देना होगा। महिला के सवाल को सुनकर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं तैयार हूं लेकिन दहेज में मुझे पूरा पाकिस्तान चाहिए। उनका जवाब सुनकर सभी हंस पड़े।

जनसंघ से शुरू किया राजनीतिक सफर

1951 में वाजपेयी भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे। उन्होंने 1955 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया. लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई लेकिन बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से चुनाव जीतकर वे लोकसभा पहुंचे।

भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की

1957 से 1977 तक (जनता पार्टी की स्थापना तक) जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। 1968 से 1973 तक वे भारतीय जनसंघ के राष्टीय अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। 1977 में पहली बार वाजपेयी गैर कांग्रेसी विदेश मंत्री बने। मोरारजी देसाई की सरकार में वह 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे।

यूएनओ में दिया हिंदी में भाषण

संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया। अटल ही पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था।  1980 में जनता पार्टी से असंतुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की।

सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री

1980 से 1986 तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे. दो बार राज्यसभा के लिए भी निर्वाचित हुए। 16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने। लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा।

लंबे समय तक रहे विपक्ष के नेता

भारत रत्न अटल विहारी वाजपेयी 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं। वे सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे हैं और जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी।

डीएवी कॉलेज में अपने ही पिता के सहपाठी बने

1948 में जब अटल जी ने डीएवी कॉलेज में एलएलबी के लिए दाखिला लिया तो उनके पिता कृष्णबिहारी लाल वाजपेयी ने भी एलएलबी करने का फैसला कर लिया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी का यह भी एक रोचक किस्सा है। 1948 में जब अटल जी ने डीएवी कॉलेज में एलएलबी के लिए दाखिला लिया तो सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त उनके पिताजी पं.कृष्णबिहारी लाल वाजपेयी ने भी यहीं से एलएलबी करने का फैसला कर लिया। छात्रावास में पिता-पुत्र एक ही कक्ष में रहते थे। विद्यार्थियों की भीड़ उन्हें देखने आती थी। दोनों एक ही कक्षा में बैठते थे। कभी पिताजी देर से पहुंचते तो प्रोफेसर ठहाकों के साथ पूछते- कहिए आपके पिताजी कहां गायब हैं? और कभी अटल जी को देर हो जाती तो पिताजी से पूछा जाता-आपके साहबजादे कहां नदारद हैं? इस असहज स्थिति से बचने के लिए बाद में दोनों ने सेक्शन बदलवा लिया था। हालांकि यहां से अटल जी एलएलबी की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। जनसंघ ने राजनीतिक दायित्वों के लिए उन्हें लखनऊ बुला लिया था।

डीएवी हॉस्टल में मनाया था आजादी का जश्न

1947 में देश की आजादी का जश्न 15 अगस्त को डीएवी छात्रावास में मनाया गया था। तब अटल जी ने अधूरी आजादी का दर्द उकेरते हुए कविता सुनाई थी। समारोह में शामिल आगरा विवि के पूर्व उपकुलपति लाला दीवानचंद ने उन्हें दस रुपये इनाम दिया था। यह उनके साहित्य सृजन का शुरुआती दौर माना जा सकता है।

झाड़े रहो कलक्टरगंज

अगर भारत रत्न अटल विहारी वाजपेयी की बात करें तो उनका यह संस्मरण हमेशा याद आता है। जब वह सन 1996 में कानपुर में एक जनसभा करने आये और भरे कलक्टरगंज में खड़े होकर कहा। आज भी कलक्टरगंज वैसा का वैसा ही है। फिर उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि झाड़े रहो कलक्टरगंज। लोगों ने खूब ठाहाके लगाये। तब से यह कनपुरियों का जुमला बन गया।

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