देश भर में धूमधाम से मनाया गया बैशाखी का पर्व।

कानपुर। सिख समाज ने गुरुवार को बैसाखी धूमधाम से मनाई। घरों में उत्सव किया गया। साथ ही नगर के गुरुद्वारा में खालसा सृजना दिवस बैसाखी पर आस्था की बयार बहती रही। बैशाखी पर गुरुद्वारे को सजाया गया। गुरु ग्रंथ साहिब की वंदना की गई। सबने वहां जाकर अरदास की व मत्था टेककर आशीर्वाद लिया।

 गर्मी व उसम को दरकिनार करके आस्था में मगन परिवार सहित लोग पूरे उत्साह के साथ पर्व मनाने आए। सुबह नौ बजे से हजूरी रागी  अपने जत्थे के साथ सबद-कीर्तन गायन किया। जत्थे ने वैशाखी के महत्व को भी बताया। कहा कि बैसाखी मेष संक्रांति के दिन मनती है। इस दिन सूर्य का मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश होता है। लोग इस दिन लोग नए कपड़े पहनकर एक दूसरे को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हैं। यही नहीं सिखों के 10वें गुरु गोविंद सिंह ने बैसाखी के अवसर पर 13 अप्रैल 1699 को खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस दिन केसरगढ़ साहिब आनंदपुर में विशेष उत्सव होता जाता है। बैशाखी पर शिशुओं को अमृतपान व नामकरण भी कराया गया। जगह-जगह बैशाखी पर कार्यक्रमों का भी आयोजन हुआ। इस दौरान लोग एक-दूसरे को गले लगाकर बधाई देते रहे। 

बैसाखी का महत्व

धार्मिक ग्रंथों में इस दिन का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि बैसाखी के दिन ही भगवान ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और इस दिन से ही सृष्टि का उद्गम हुआ है। वहीं, त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी आज के दिन ही अयोध्या के राजा बने थे। जबकि प्राचीन भारत में इस दिन महाराजा विक्रमादित्य ने श्री विक्रमी संवत की शुरुआत की थी और आधुनिक भारत में सिक्ख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी ने 13 अप्रैल 1699 ई. को खालसा पंत की स्थापना की थी। ऐसे में इस पर्व का विशेष महत्व है।

बैसाखी पर्व क्यों मनाया जाता है

यह पर्व नववर्ष के तौर पर भी मनाया जाता है। इस दिन रबी फसल की पूरी तैयारी हो जाती है। इस मौके पर किसान खुशियां मनाते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और नाच-गाकर ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। ऐसी मान्यता है कि किसान रबी फसल सर्वप्रथम अग्नि देव को अर्पित करते हैं। इसके बाद ग्रहण करते हैं। पूर्वाेत्तर राज्य असम में इस दिन बोहाग बिहू मनाई जाती है।

बैसाखी पर्व नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है

बैसाखी का पर्व देश के सभी हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। बंगाल और ओडिशा में इसे नववर्ष के रूप में मनाते हैं। इस दिन मेष संक्रांति भी मनाई जाती है, जिसमें सूर्य देव मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन सूर्य आधा उत्तरायण हो जाता है, अर्थात उत्तरायण की आधी दूरी सूर्य देव तय कर लेते हैं। इस दिन भगवान मधुसूदन और शिव जी संग मां अन्नपूर्णा की पूजा आराधना की जाती है।

कैसे पड़ा बैसाखी नाम?

 बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है. विशाखा नक्षत्र पूर्णिमा में होने के कारण इस माह को बैसाखी कहते हैं. कुल मिलाकर, वैशाख माह के पहले दिन को बैसाखी कहा गया है. इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है.

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